1967 में इंदिरा गांधी ने रोका था सोना, आज मोदी समझा रहे हैं — आखिर सरकारें जनता के गहनों से इतनी परेशान क्यों हो जाती हैं?
नई दिल्ली।
भारत में एक चीज़ कभी नहीं बदलती — शादी में रिश्तेदारों की सलाह और भारतीयों का सोने से मोह। फर्क बस इतना है कि जब-जब देश की तिजोरी पर दबाव बढ़ता है, तब-तब प्रधानमंत्री जनता से कहते दिखाई देते हैं — “भाइयों और बहनों, ज़रा सोना खरीदने पर लगाम लगाइए!”
सोशल मीडिया पर इन दिनों का 6 जून 1967 का पुराना अख़बार खूब वायरल हो रहा है। उस समय ने देशवासियों से अपील की थी — “सोना मत खरीदिए, राष्ट्रीय अनुशासन अपनाइए।”
आज लगभग वैसी ही चर्चा तब तेज हुई जब ने विदेशी मुद्रा बचाने, आयात घटाने और देशहित में संयम की बात कही।
आखिर प्रधानमंत्री लोग सोने के पीछे क्यों पड़ जाते हैं?
क्योंकि भारत का “सोने से प्रेम” कई बार अर्थव्यवस्था पर ऐसा बोझ डाल देता है जैसे बरात में एक ही जनरेटर पर पूरा मोहल्ला नाच रहा हो।
भारत दुनिया में सबसे ज्यादा सोना खरीदने वाले देशों में है। सोना बाहर से आता है और उसके बदले देश की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। यानी जितना ज्यादा सोना आएगा, उतना ज्यादा पैसा बाहर जाएगा। और जब पैसा बाहर जाता है, तो सरकार की चिंता वैसे ही बढ़ती है जैसे महीने के आखिर में घर का बजट।
1967 हो या आज का समय — कहानी लगभग वही है:
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विदेशी मुद्रा बचाओ
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बाहर से आने वाला सामान कम करो
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देश में उत्पादन बढ़ाओ
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और जनता से कहो: “थोड़ा कम चमको, देश ज्यादा चमकेगा।”
जनता भी कम नहीं
भारतीय परिवारों में सोना सिर्फ गहना नहीं, पीढ़ियों की जमा पूंजी माना जाता है।
दादी आज भी कहती हैं:
“बेटा, मुश्किल समय में चूड़ी ही काम आती है।”
इसी वजह से सरकार चाहे जितना समझाए, लेकिन त्योहार और शादी आते ही लोग सुनार की दुकान की ओर ऐसे दौड़ते हैं जैसे बरसात से पहले चींटियाँ दाना जुटाती हैं।
इतिहास क्या सिखाता है?
यह किसी एक दल या नेता का मामला नहीं है।
जब भी देश पर आर्थिक दबाव बढ़ता है, हर सरकार — चाहे की हो या की — सोने की खरीद को लेकर चिंता जताती है।
क्योंकि अर्थव्यवस्था का सीधा हिसाब है:
“घर में जितना ज्यादा सोना बंद होगा, देश से उतना ज्यादा धन बाहर जाएगा।”
और शायद इसी वजह से हर दौर का प्रधानमंत्री अंत में यही कहता है:
“देश पहले, गहने बाद में!




