देश बदल गया, सरकारें बदल गईं… लेकिन प्रधानमंत्री की एक टेंशन आज भी वही है — भारतीयों का सोने से प्यार।
नई दिल्ली:
भारत में दो चीजें कभी खत्म नहीं होतीं — शादी में मुफ्त की सलाह और सोने के प्रति लोगों का प्यार। फर्क सिर्फ इतना है कि जब-जब देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव आता है, तब-तब प्रधानमंत्री जनता से कहते दिखाई देते हैं — “भाइयों और बहनों, थोड़ा कम सोना खरीदिए!”
सोशल मीडिया पर इन दिनों The Hindu का 1967 का एक पुराना अखबार वायरल है। उस समय Indira Gandhi ने देशवासियों से अपील की थी कि सोना खरीदने से बचें और “राष्ट्रीय अनुशासन” अपनाएँ।
अब लगभग वैसी ही चर्चा फिर शुरू हो गई है, क्योंकि Narendra Modi ने भी विदेशी मुद्रा बचाने, आयात घटाने और संयम बरतने की बात कही है।
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आखिर सरकारें सोने के पीछे क्यों पड़ जाती हैं?
क्योंकि भारत का सोने से रिश्ता सिर्फ गहनों तक सीमित नहीं है। यहाँ सोना भावनाओं, सुरक्षा और बचत — तीनों का मिश्रण है।
लेकिन सरकार का गणित थोड़ा अलग होता है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना खरीदने वाले देशों में है। यह सोना बाहर से आता है और उसके बदले देश की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। यानी जितना ज्यादा सोना आएगा, उतना ज्यादा पैसा देश से बाहर जाएगा।
सरकार की चिंता भी यहीं से शुरू होती है।
आर्थिक जानकारों के मुताबिक जब विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता है, तब सरकारें चाहती हैं कि लोग कम सोना खरीदें ताकि आयात बिल कम हो सके।
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जनता कहती है — “बैंक बाद में, कंगन पहले”
भारतीय परिवारों में आज भी सोना सिर्फ गहना नहीं, “मुश्किल वक्त का साथी” माना जाता है।
दादी-नानी की एक लाइन तो लगभग हर घर में सुनी जाती है:
> “बेटा, वक्त खराब हो तो चूड़ी ही काम आती है।”
इसी वजह से सरकारें समझाती रहती हैं और जनता त्योहार आते ही ज्वेलरी दुकान की तरफ ऐसे निकल पड़ती है जैसे बारिश से पहले चींटियाँ दाना जमा करती हैं।
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इतिहास का मजेदार सच
1967 हो या आज का दौर — कहानी लगभग एक जैसी है:
विदेशी मुद्रा बचाओ
आयात कम करो
देशी उत्पादन बढ़ाओ
और जनता से कहो — “थोड़ा कम चमको, देश ज्यादा चमकेगा।”
यानी राजनीति बदल सकती है, चेहरे बदल सकते हैं, लेकिन भारत और सोने की प्रेम कहानी शायद कभी नहीं बदलेगी।
और शायद इसी वजह से हर दौर का प्रधानमंत्री आखिर में यही कहता है: