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    “कोयला निकलेगा अरबों का, लेकिन गांव झेलेगा अंधियारा!” पेलमा परियोजना पर किसानों का फूटा गुस्सा

    Janta TopBy Janta TopMay 11, 2026Updated:May 11, 2026No Comments3 Mins Read
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    “कोयला निकलेगा अरबों का, लेकिन गांव झेलेगा अंधियारा!” पेलमा परियोजना पर किसानों का फूटा गुस्सा

    Raigarh के तमनार इलाके में पेलमा कोल परियोजना को लेकर अब गांवों में माहौल गरमा चुका है। चौपाल से लेकर हाट-बाजार तक एक ही चर्चा है — “खेत किसान के, मलाई कंपनी की!” ग्रामीणों का आरोप है कि जिस जमीन से कंपनी अरबों कमाएगी, उसी जमीन के मालिक किसान को “ऊंट के मुंह में जीरा” जैसा मुआवजा देकर हमेशा के लिए उजाड़ा जा रहा है।

    ग्रामीणों का कहना है कि एक एकड़ जमीन के नीचे दबे कोयले से कंपनी 15 से 20 करोड़ रुपये तक की कमाई कर सकती है, जबकि किसान को मुश्किल से 40 से 50 लाख रुपये प्रति एकड़ तक मुआवजा मिलता है। गांव के बुजुर्ग तंज कसते हुए कहते हैं — “मुर्गी हमारी, अंडा उनका… और ऊपर से एहसान भी हम पर!”

    स्थानीय लोगों के मुताबिक, खदान से निकलने वाला G-12 ग्रेड कोयला 1500 से 2500 रुपये प्रति टन तक बिकता है। अगर 15 मिलियन टन सालाना उत्पादन माना जाए तो सालाना कारोबार करीब 3000 करोड़ रुपये बैठता है। यानी 20 साल में 60 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई। अब ग्रामीण पूछ रहे हैं — “धरती हमारी, कोयला हमारा, नुकसान हमारा… फिर फायदा सिर्फ कंपनी का क्यों?”

    गांव वाले गिना रहे बड़े दुष्परिणाम

    ग्रामीणों और स्थानीय सामाजिक संगठनों का कहना है कि ओपनकास्ट खनन शुरू होते ही इलाके का पूरा भूगोल बदल जाएगा। लोगों के मुताबिक:

    खेती की उपजाऊ जमीन हमेशा के लिए बर्बाद हो सकती है

    भूजल स्तर तेजी से नीचे जा सकता है

    केलो नदी और आसपास के जलस्रोत प्रभावित होने का खतरा

    धूल और PM2.5 प्रदूषण से सांस, दमा और फेफड़ों की बीमारियां बढ़ सकती हैं

    blasting और भारी मशीनों से गांवों में कंपन और दरारों की आशंका

    जंगल और हरियाली खत्म होने से तापमान बढ़ने का डर

    विस्थापन के बाद किसान मजदूर बनने को मजबूर हो सकते हैं

    गांवों में लोग कह रहे हैं — “आज खेत जाएगा, कल पहचान जाएगी।” कई ग्रामीणों का कहना है कि एक बार जमीन चली गई तो पैसा खत्म होने में देर नहीं लगेगी, लेकिन आने वाली पीढ़ियां हमेशा के लिए जमीन और रोजगार दोनों से हाथ धो बैठेंगी।

    Hinjhar, Jaridih और Lalpur समेत कई गांवों में अब आवाज उठ रही है कि किसानों को सिर्फ मुआवजा नहीं, बल्कि हिस्सेदारी और स्थायी भविष्य की गारंटी चाहिए।

    गांव के युवाओं का कहना है:

    > “जमीन बिकेगी तो पैसा कुछ साल चलेगा, लेकिन खेत बचा रहेगा तो पीढ़ियां जिंदा रहेंगी… क्योंकि किसान के लिए जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, उसकी मां होती है।”

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