एक स्वर्णिम दौर, जब कैडर ही क्रेडिबिलिटी थी…
एक वो भी दौर था जब रायगढ़ भाजपा की सियासी बिसात पर दो मजबूत स्तंभ हुआ करते थे—पूर्व विधायक विजय अग्रवाल और स्वर्गीय रोशन लाल अग्रवाल। ये वो जमीनी चेहरे थे जो विधायकी के रुतबे से ज्यादा संगठन के ‘कैडर बेस’ अनुशासन और कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान की चिंता करते थे। कार्यकर्ताओं के सुख-दुख को सुनना और पार्टी की मूल रीति-नीति को अक्षुण्ण रखना इनकी राजनीति का मूल मंत्र था।
ओपी चौधरी: रायगढ़ के भाग्यविधाता, विकास के ‘सुपर कॉप’
लेकिन आज वक्त बदला है और रायगढ़ को मिला है एक ऐसा नेतृत्व, जिस पर पूरे छत्तीसगढ़ को नाज है। पूर्व आईएएस और वर्तमान कैबिनेट मंत्री ओपी चौधरी आज रायगढ़ के विधायक हैं। विधायक बनते ही उनके कंधों पर प्रदेश के वित्त मंत्रालय और अन्य भारी-भरकम विभागों की कमान सौंप दी गई, जिसे वे अपनी चिरपरिचित प्रशासनिक सूझबूझ और बेदाग ईमानदारी से बखूबी संभाल रहे हैं। इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं है कि ओपी चौधरी के इस विराट कद से पूरे प्रदेश में रायगढ़ का मान-सम्मान और राजनीतिक रसूख सातवें आसमान पर पहुंच गया है।
जनता अपनी आंखों से देख रही है कि दशकों से जो रायगढ़ उपेक्षित था, आज उसकी तस्वीर बदल रही है। रायगढ़ को छत्तीसगढ़ का सबसे ‘मॉर्डन और हाइटेक शहर’ बनाने का जो संकल्प ओपी चौधरी ने लिया है, उसे पूरा करने के लिए वे दिन-रात एक किए हुए हैं। उनके इस भागीरथ प्रयास, विजनरी सोच और कड़े परिश्रम की विरोधी भी दबी जुबान से तारीफ करते हैं।
मंत्रालयों के चक्रव्यूह का फायदा उठाता स्थानीय नेतृत्व
मगर सिक्के का दूसरा पहलू बेहद चिंताजनक है। प्रदेश की बड़ी और कड़ी चुनौतियों को पूरा करने की इस आपाधापी और मंत्रालयों की व्यस्तता के बीच, विधायक ओपी चौधरी ने संगठनात्मक कार्यों की पूरी जिम्मेदारी—या यूं कहें कि जिला भाजपा का पूरा दारोमदार—स्थानीय जिला आलाकमान के भरोसे छोड़ दिया। लेकिन विडंबना देखिए, जहां एक तरफ ओपी चौधरी विकास की नई इबारत लिख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय जिला नेतृत्व संगठन को संभालने में पूरी तरह फ्लॉप साबित हो रहा है।
‘सुशासन तिहार’ में वरिष्ठता का ‘चीरहरण’!
जिला संगठन के इस बेपटरी ढर्रे का सबसे तीखा नजारा हाल ही में ‘सुशासन तिहार’ के मंच पर देखने को मिला। मंच की अग्रिम दीर्घा (पहली पंक्ति) में वे नए-नवेले ‘मेहमान’ सीना चौड़ा करके, वीआईपी टोन में अपना तथाकथित ‘स्वैग’ झाड़ रहे थे, जो कल तक कांग्रेस का झंडा थामे भाजपा को पानी पी-पीकर कोसते थे।
और दूसरी तरफ? जिन विजय अग्रवाल ने अपनी पूरी जिंदगी रायगढ़ में भाजपा का झंडा उठाने और संगठन को सींचने में खपा दी, वे मंच की चौथी और आखिरी कतार में गुमनाम बैठे थे। सत्ता की चकाचौंध में चूर नए नवेले पदाधिकारियों को इतनी शिष्टता और संस्कारी सीख तक याद नहीं रही कि अपनी कुर्सी छोड़कर पार्टी के इस भीष्म पितामह को ससम्मान आगे की पंक्ति में बुला लें। जनता सब देख रही है और समझ भी रही है कि कैसे सत्ता की मलाई चाटने वाले लोग संगठन को हाईजैक कर चुके हैं।

दशकों की तपस्या बनाम रातों-रात ‘भगवा’ का शॉर्टकट
भाजपा की जिस जटिल कार्यप्रणाली की कसमें खाई जाती हैं, जहां पन्ना प्रभारी से लेकर बूथ और मंडल अध्यक्ष की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते कार्यकर्ताओं के सिर के बाल सफेद हो जाते हैं, कईयों की पीढ़ियां खप जाती हैं और आज भी सच्चे निष्ठावान कार्यकर्ता एक अदद अदना से पद के लिए उपेक्षित बैठे हैं… वहीं दूसरी तरफ, गंगा नहाकर आए इन नए कांग्रेसी ‘प्रवासियों’ के लिए रेड कार्पेट बिछाया जा रहा है।
खासमखास’ को सेट करने के लिए पदों की बंपर पैदावार!
चर्चा तो यहां तक आम है कि जिलाध्यक्ष की ‘किचन कैबिनेट’ के इन चहेतों को—जिन्होंने सत्ता की छांव में आते ही रातों-रात भगवा चोला ओढ़ लिया है—खुश रखने के लिए जिला संगठन की मुख्य बॉडी में नियमों को ताक पर रखकर ‘नए-नए पदों’ का आविष्कार कर दिया गया है! इन्हें मुख्य चेहरों में इस तरह फिट किया जा रहा है मानो इनके बिना जिला भाजपा का वजूद ही खत्म हो जाएगा।
नतीजा यह है कि वर्षों से दरी बिछाने वाले, नारे लगाने वाले और लाठियां खाने वाले मूल भाजपाई कार्यकर्ता आज खुद को अपनी ही पार्टी में बेगाना महसूस कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं के भीतर का आक्रोश लावा बनकर उबल रहा है, जो सिर्फ और सिर्फ पार्टी के प्रति अटूट निष्ठा की वजह से थमा हुआ है। लेकिन स्थानीय आकाओं को याद रखना होगा कि विधायक ओपी चौधरी विकास की राह में रायगढ़ का नाम जितना ऊंचा कर रहे हैं, संगठन की ये अंदरूनी कमियां जमीनी स्तर पर पार्टी को उतना ही खोखला कर रही हैं!






