रायगढ़। अनुशासन और कैडर-बेस्ड राजनीति का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इन दिनों रायगढ़ में आंतरिक कलह और गुटबाजी के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। हाल ही में हुई एल्डरमैन (मनोनीत पार्षद) की घोषणा ने पार्टी के भीतर धधक रही असंतोष की आग को घी देने का काम किया है। इस फैसले के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के विरोध के स्वर इस कदर मुखर हुए हैं कि संगठन की आंतरिक स्थिति पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गई है।
चौंकाने वाली बात यह है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के इस फैसले का विरोध किसी नए कार्यकर्ता ने नहीं, बल्कि मंडल से लेकर जिला और प्रदेश स्तर के पदाधिकारियों द्वारा सार्वजनिक रूप से किया जा रहा है।
जिलाध्यक्ष के ‘फ्लॉप शो’ और गिरवी सियासत पर तीखे बाण
एल्डरमैन की सूची सामने आते ही मचे घमासान की सबसे गाढ़ी गाज सीधे जिला संगठन की कप्तानी पर गिरी है। असंतुष्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं ने वर्तमान जिलाध्यक्ष के नेतृत्व को आड़े हाथों लेते हुए इसे ‘अल्ट्रा फ्लॉप शो’ करार दे दिया। सोशल मीडिया और शहर के चौक-चौराहों पर चर्चाओं का बाजार इस बात को लेकर गर्म है कि जिनके खुद के पैर डगमगा रहे हों, वे संगठन को क्या संभालेंगे।
नाराज कार्यकर्ताओं ने अतीत के पन्ने पलटते हुए याद दिलाया कि जब महोदय जिला महामंत्री के पद पर आसीन थे, तब अपनी ही अगुवाई वाली विधानसभा सीट को विपक्षी पाले में ‘गिरवी’ रख बैठे थे। तंज कसने वालों ने यहाँ तक कह दिया कि जिस नेतृत्व के खाते में खुद की हार दर्ज हो, उसकी पसंद भला कैसी होगी!
इतना ही नहीं, घरघोड़ा नगर पंचायत के पुराने जख्मों को भी दोबारा हरा किया गया। कार्यकर्ताओं ने सरेआम आरोप लगाया कि जब घरघोड़ा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत के पार्षद थे, तब किसी ‘अदृश्य सेटिंग’ और दबाव के आगे घुटने टेक दिए गए और भाजपा की थाली से खींचकर अध्यक्ष की कुर्सी एक निर्दलीय की झोली में डाल दी गई। कार्यकर्ताओं का सीधा सवाल है कि जो नेतृत्व अपने बहुमत को संभाल नहीं पाया, वह अब अपनों के हक में क्या फैसला लेगा?
महिला प्रतिनिधित्व और जातीय समीकरण पर उठे सवाल
इस सूची के सामने आने के बाद भाजपा के उन दावों पर भी स्थानीय स्तर पर उंगलियां उठ रही हैं जो वह राष्ट्रीय स्तर पर महिला सशक्तिकरण और 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को लेकर करती है। स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि धरातल पर महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में इस सूची में भारी उदासीनता बरती गई है।
इसके साथ ही, रायगढ़ के सामाजिक और जातीय समीकरण को साधने में भी स्थानीय चयन प्रक्रिया पूरी तरह विफल नजर आई। राजनैतिक विश्लेषकों का अनुमान था कि सभी समाजों को प्रतिनिधित्व मिलेगा, लेकिन सूची आते ही सारे कयास धरे के धरे रह गए। कुल 8 मनोनीत एल्डरमैन में से 3 नाम (मनोज शर्मा, शशिकांत शर्मा और पप्पू कुमार पाण्डेय) एक ही वर्ग से होने के कारण जातिगत संतुलन का गणित पूरी तरह प्रभावित हुआ है, जिससे अन्य समाजों के दावेदारों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।
कार्यकर्ताओं की योग्यता बनाम आपसी खींचतान
राजनैतिक गलियारों में चर्चा इस बात पर नहीं है कि जो 8 नाम घोषित हुए हैं, वे अयोग्य हैं। जमीनी हकीकत यह है कि मनोनीत किए गए सभी 8 सदस्य लगातार सामाजिक और जनहित के कार्यों में सक्रिय रहे हैं और उनका अपना मजबूत वजूद है। लेकिन, स्थानीय स्तर पर मजबूत समन्वय के अभाव और बड़े नेताओं की आपसी खींचतान (कोर कमेटी की अंदरूनी लड़ाई) ने इन कर्मठ कार्यकर्ताओं की नियुक्ति के जश्न को भी विवादों के साए में ला खड़ा किया है।
अब देखना यह होगा कि अपने ही पदाधिकारियों द्वारा संगठन के फैसलों पर उठाए जा रहे इन गंभीर और तीखे सवालों पर प्रदेश नेतृत्व अनुशासनहीनता के तहत कोई कड़ा कदम उठाता है, या फिर रायगढ़ भाजपा में आंतरिक असंतोष की यह खाई और गहरी होती जाएगी।