रायगढ़। जिले में लाइमस्टोन और डोलोमाइट खदानों को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद सामने आया है। हालिया कार्रवाई में प्रशासन ने कुछ अवैध खदानों पर कार्रवाई की है, लेकिन इसके साथ ही पुराने मामलों की फाइलें भी चर्चा में आ गई हैं। सवाल उठ रहे हैं कि जिन मामलों में पहले एनजीटी और राज्य शासन स्तर से जांच के आदेश दिए गए थे, उनका आखिर क्या हुआ?
जानकारी के अनुसार, एनजीटी की प्रिंसिपल बेंच ने बरमकेला तहसील की 12 डोलोमाइट खनिपट्टों की जांच के लिए समिति गठित की थी। समिति में रायगढ़ और सारंगढ़-बिलाईगढ़ के कलेक्टरों को भी शामिल किया गया था। इसके बाद छत्तीसगढ़ शासन ने भी ट्रिगर जांच के आदेश जारी किए थे।
हालांकि, आरोप है कि दोनों बार प्रस्तुत रिपोर्टों में गंभीर अनियमितताओं को नजरअंदाज कर दिया गया। जबकि खनिपट्टों से लगी भूमि पर अवैध खनन होने के आरोप लगातार सामने आते रहे। बताया जा रहा है कि गूगल मैप और अन्य दस्तावेजों में भी कई स्थानों पर खनन गतिविधियां दिखाई दे रही थीं, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
जिन कंपनियों के नाम जांच आदेशों से जुड़े बताए गए हैं, उनमें झुम मिनरल्स, बाबा बैजनाथ मिनरल्स, बिंदल मिनरल्स, गंगा मिनरल्स, रायगढ़ मिनरल्स, सतगुरु साईं माइंस प्रा. लि., जय दुर्गा क्रशर, जय मां चंद्रहासिनी ग्रामोद्योग, ओम मिनरल्स, हरिओम मिनरल्स और नवदुर्गा क्रशर सहित अन्य शामिल हैं। यह उल्लेख जांच आदेशों के संदर्भ में है और इसका अर्थ किसी कंपनी की दोषसिद्धि नहीं है।
इधर प्रशासन द्वारा हाल में अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई किए जाने के बाद अब यह मांग भी तेज हो गई है कि पुराने मामलों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जाए। यदि पहले की रिपोर्टों में किसी प्रकार की लापरवाही या तथ्यों को दबाने की बात सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों और दोषियों पर भी कार्रवाई हो।
जनचर्चा का विषय यह भी है कि यदि नियमों के विरुद्ध वर्षों तक खनन होता रहा, तो उसकी जवाबदेही किसकी तय होगी? अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या पुराने मामलों की फाइलें फिर खुलेंगी और क्या इस बार जांच अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचेगी।







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