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    फ़ादर डे स्पेशल: शहीद पिता की विरासत, मां का संघर्ष और बेटे का संकल्प: अभिनव कांत सिंह की प्रेरक कहानी

    Janta TopBy Janta TopJune 21, 2026Updated:June 21, 2026No Comments3 Mins Read
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    Jantatop.Com | विशेष प्रेरणादायक रिपोर्ट

    “कुछ रिश्ते वक्त के साथ खत्म नहीं होते, वे जिम्मेदारियों में बदलकर पीढ़ियों तक जिंदा रहते हैं।”

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    “जो चले गए, वो कहानी बन गए,

    जो संभल गए, वो निशानी बन गए।

    एक पिता शहीद हुआ तो एक बेटा,

    उसी वर्दी की नई जुबानी बन गया।”

    रायगढ़। कुछ कहानियां केवल एक परिवार की नहीं होतीं, बल्कि पूरी पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन जाती हैं। ऐसी ही कहानी है पुलिस निरीक्षक अभिनव कांत सिंह की, जिनके जीवन में पिता की शहादत, मां का संघर्ष और कर्तव्य के प्रति समर्पण एक मिसाल बनकर सामने आया है।

     

    1 जुलाई 1992 का दिन उनके परिवार की जिंदगी बदल देने वाला दिन बन गया। उनके पिता, उपनिरीक्षक टीके सिंह, ड्यूटी के दौरान शहीद हो गए। उस समय अभिनव महज 9 वर्ष के थे। एक बच्चे के सिर से पिता का साया उठ गया, लेकिन उसी दिन एक नए संकल्प ने जन्म लिया।

    उस दिन परिवार नए सरकारी आवास में सामान जमा रहा था। घर से निकलते समय पिता ने कहा था कि रात को परिवार के साथ बाहर खाना खाने जाएंगे, लेकिन वह वादा अधूरा रह गया। आंदोलन हिंसक हुआ, पथराव हुआ और कर्तव्य निभाते हुए टीके सिंह ने अपने साथियों को सुरक्षित निकाल लिया, लेकिन स्वयं शहीद हो गए।

     

    पिता की शहादत के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनकी मां के कंधों पर आ गई। उन्होंने एक मां ही नहीं, बल्कि पिता बनकर भी चार बच्चों की परवरिश की। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा, अनुशासन और संस्कारों से कभी समझौता नहीं किया।

    इसी का परिणाम है कि बड़े भाई वैभव कांत सिंह प्रोफेसर बने, छोटे भाई अभ्युदय कांत सिंह खेल अधिकारी बने, बहन प्रियांवदा सिंह चौहान सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं और स्वयं अभिनव कांत सिंह पुलिस निरीक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

    परिवार चाहता था कि अभिनव प्रशासनिक सेवा में जाएं, लेकिन पिता की वर्दी और उनकी शहादत की स्मृतियों ने उन्हें पुलिस सेवा की राह पर आगे बढ़ा दिया। वर्ष 2006 में उन्होंने पुलिस भर्ती परीक्षा उत्तीर्ण कर सेवा में प्रवेश किया।

    नक्सल प्रभावित बीजापुर और सुकमा जैसे क्षेत्रों में सेवा देते हुए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन हर कठिन समय में पिता की याद और मां का संघर्ष उन्हें मजबूत बनाता रहा।

    रायगढ़ से उनका रिश्ता भी बेहद खास है। उनके पिता की पोस्टिंग वर्ष 1978 से 1985 तक रायगढ़ जिले में रही थी और अभिनव का जन्म भी यहीं हुआ था। वर्ष 2021 में जब उन्हें थाना चक्रधर नगर का प्रभारी बनाया गया, तो यह उनके जीवन का सबसे भावुक पल था। जिस क्षेत्र में कभी उनके पिता ने सेवा दी थी, उसी क्षेत्र की जिम्मेदारी वर्षों बाद बेटे के हाथों में थी।

    आज भी अभिनव अपने कार्यालय में पिता की तस्वीर अपने सामने रखते हैं। उनका मानना है कि वही तस्वीर उन्हें हर दिन ईमानदारी, जिम्मेदारी और कर्तव्यनिष्ठा की याद दिलाती है।

    वे कहते हैं, “मेरे पिता ने मुझे निर्भीक होना सिखाया। हर परिस्थिति का सामना करना सिखाया। मैं उनकी सीख को अपने कर्मों के माध्यम से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा हूं।”

    आज जब वे स्वयं एक पिता हैं, तब उन्हें अपने पिता का महत्व और गहराई से समझ आता है। उनका मानना है कि पिता केवल परिवार का सहारा नहीं होते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी सीख होते हैं।

    “कुछ लोग तस्वीरों में नहीं,

    उसूलों में जिंदा रहते हैं।

    पिता चले जाते हैं,

    लेकिन उनकी सीख उम्रभर साथ रहती है।”

    यह कहानी सिर्फ एक पुलिस अधिकारी की नहीं, बल्कि शहादत, संघर्ष, संस्कार और संकल्प की विरासत की कहानी है।

    — Jantatop.Com

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