रायगढ़ जिला दंडाधिकारी (DM) द्वारा 04 नवंबर 2025 को विजय कुमार उर्फ ‘बिज्जू’ (निवासी सिंधी कॉलोनी, रायगढ़) के खिलाफ पारित जिलाबदर आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है। जिला प्रशासन ने विजय राजपूत को रायगढ़ सहित आसपास के 8 समीपवर्ती जिलों की सीमाओं से एक वर्ष के लिए निष्कासित करने का आदेश दिया था।
अदालत ने इस आदेश को नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन मानते हुए प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर टिप्पणी की।
अधिवक्ता आशीष कुमार मिश्रा की सशक्त पैरवी
इस पूरे मामले में पीड़ित पक्ष की ओर से मिश्रा चेम्बर, रायगढ़ के वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष कुमार मिश्रा और पल्लव मोंगिया ने अत्यंत सूझबूझ और कानूनी दक्षता का परिचय दिया:
* प्रशासनिक कमियों को उजागर किया: अधिवक्ता आशीष कुमार मिश्रा ने अदालत के समक्ष यह तथ्यात्मक पक्ष रखा कि जिला दंडाधिकारी ने विजय राजपूत को बिना कोई कारण बताओ नोटिस दिए और बिना सुनवाई का अवसर प्रदान किए (एकपक्षीय) यह दंडात्मक आदेश पारित कर दिया था।
* तथ्यों की सही प्रस्तुति: उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि पुलिस प्रशासन ने जिन मामलों को आधार बनाकर यह कार्रवाई की थी, उनमें से कई मामलों में विजय राजपूत पहले ही न्यायालय द्वारा दोषमुक्त (Acquitted) किए जा चुके थे।
* संवैधानिक अधिकारों की रक्षा: हाईकोर्ट द्वारा प्रक्रियात्मक आधार पर याचिका निरस्त होने के बाद भी अधिवक्ता मिश्रा ने हार नहीं मानी और मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) तक ले गए, जहाँ वे नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा कराने में सफल रहे।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय (पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता एवं जस्टिस शील नागू)
माननीय उच्चतम न्यायालय की डबल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया:
* रूटीन आदेश पर रोक: केवल लंबित आपराधिक मामलों के आधार पर किसी भी नागरिक के खिलाफ निष्कासन का आदेश एक ‘रूटीन प्रक्रिया’ की तरह पारित नहीं किया जा सकता।
* अधिकारों का दुरुपयोग: बिना ठोस और विशिष्ट कारणों के ऐसा आदेश जारी करना प्रशासनिक शक्तियों का मनमाना उपयोग है।
* विशिष्ट कारण अनिवार्य: किसी व्यक्ति को जिले से बाहर करने का आदेश तभी वैध माना जा सकता है जब उसकी उपस्थिति से क्षेत्र की शांति और सुरक्षा को प्रत्यक्ष खतरा हो और इसका स्पष्ट उल्लेख आदेश में किया गया हो।
कानूनी बिरादरी और पीड़ित की प्रतिक्रिया
इस निर्णय को आम आदमी के मौलिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मील का पत्थर माना जा रहा है। अधिवक्ता आशीष कुमार मिश्रा की इस दूरदर्शी कानूनी लड़ाई के कारण दशकों से चली आ रही प्रशासनिक भ्रांतियों पर विराम लगा है।
राहत मिलने के बाद विजय राजपूत ने न्यायपालिका के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए कहा कि अधिवक्ता आशीष कुमार मिश्रा की उत्कृष्ट पैरवी के बल पर ही उन्हें न्याय मिला है, जिससे सिद्ध होता है कि कानून के समक्ष सभी समान हैं और न्याय व्यवस्था पर आम जन का विश्वास और सुदृढ़ हुआ है।