रायगढ़। कहते हैं “आग लगे बस्ती में, हम अपनी मस्ती में”—लेकिन इस बार मामला इतना सीधा नहीं है। करीब ₹22.55 करोड़ के तथाकथित केनाल लिंक रोड प्रोजेक्ट ने शहर में विकास से ज्यादा बहस और बवाल खड़ा कर दिया है।
सूत्रों की मानें तो जिस प्रोजेक्ट को “केनाल लिंक” बताया जा रहा है, उसमें नहर/नाले का हिस्सा नाममात्र (करीब 10%) ही है, बाकी पूरा खेल सड़क निर्माण का है। ऐसे में लोग पूछ रहे हैं—“नाम केनाल का, काम सड़क का… आखिर माजरा क्या है?”
“विकास” बनाम “विस्थापन”
इंदिरा नगर जोगीडीपा रोड के रहवासी और दुकानदार पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि:
प्रस्तावित 18 मीटर चौड़ी सड़क और पुल से
दशकों पुराने घर-दुकान टूटेंगे
और रोज़गार पर सीधा असर पड़ेगा
लोगों की जुबान पर एक ही बात—“विकास चाहिए, लेकिन विनाश नहीं।”
मुआवज़े की गूंज—“किसके हिस्से क्या?”
अंदरखाने चर्चा है कि करोड़ों का मुआवज़ा राज्य सरकार से निगम के खाते में आ चुका है। अब सवाल उठ रहा है— 👉 “जिसका नुकसान होगा, क्या उसे हक मिलेगा या फिर ‘बंदरबांट’ का खेल चलेगा?”
कहावत फिर से याद आ रही है—“जिसकी लाठी उसकी भैंस”।
जनसुनवाई—सिर्फ खानापूर्ति?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्होंने जनसुनवाई में:
पुल की लोकेशन बदलने
या सड़क की चौड़ाई कम करने की मांग रखी
लेकिन “सुनवाई हुई जरूर, सुनने वाला कोई नहीं”—ऐसी चर्चा गलियों में आम है।
अब सियासत का इम्तिहान
गौरतलब है कि चारों दिशाओं में फैले रायगढ़ शहर के नगर निगम चुनाव में इसी क्षेत्र से महापौर को सबसे ज्यादा वोट मिले थे।
यानी साफ है—इस इलाके की जनता की उम्मीदें भी सबसे ज्यादा हैं।
अब देखना दिलचस्प होगा कि: 👉 क्या महापौर अपनी “सबसे मजबूत वोट बैंक” की आवाज़ सुनते हैं?
👉 या फिर “घर के ही चिराग से घर जले” वाली कहावत सच होगी?
रायगढ़ विकास—या विवाद?
फिलहाल हालात ऐसे हैं कि यह प्रोजेक्ट रायगढ़ के विकास की कहानी में एक नया अध्याय जरूर जोड़ रहा है,
लेकिन यह अध्याय “विकास” से ज्यादा “विवाद” के पन्नों में लिखा जा रहा है।