कब्रिस्तान और चरनोई डकार गए रायगढ़ के रसूखदार कॉलोनाइजर! साहब से ‘सेटिंग’ कर बिना बिक्री नकल के कूट दी आवंटित भूमि की रजिस्ट्री, कलेक्टर जनदर्शन में खुली पोल
रायगढ़ (Jantatop.com) रायगढ़ के बहुचर्चित कब्रिस्तान और चरनोई भूमि घोटाले में सोमवार को एक बड़ा और निर्णायक मोड़ आ गया। Jantatop.com द्वारा इस महा-घोटाले का खुलासा किए जाने के बाद, कल पीड़ित ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पूरे दस्तावेजी सबूतों के साथ सीधे जिला कलेक्टर के जनदर्शन में धावा बोल दिया। लिखित शिकायत सौंपते ही प्रशासनिक गलियारों से लेकर अवैध रूप से सरकारी जमीनों की खरीद-बिक्री करने वाले रसूखदार कॉलोनाइजरों के बीच हड़कंप मच गया है।
सवाल बड़ा है: अ-हस्तांतरणीय आवंटित भूमि की रजिस्ट्री कैसे हो गई?
इस पूरे मामले का सबसे हैरान करने वाला और गंभीर पहलू यही है कि शासन द्वारा भूमिहीनों को या विशेष परिस्थितियों में अदला-बदली के तहत जो सरकारी भूमि आवंटित की जाती है, वह ‘अ-हस्तांतरणीय’ (Non-transferable) होती है। राजस्व नियमों के अनुसार, इस श्रेणी की शासकीय भूमि को बिना जिला कलेक्टर की लिखित अनुमति यानी **’बिक्री नकल’** के किसी भी हाल में बेचा या खरीदा नहीं जा सकता। उप-पंजीयक (Sub-Registrar) कार्यालय ऐसी जमीनों की रजिस्ट्री करने का अधिकार ही नहीं रखता।
लेकिन रायगढ़ के रसूखदार कॉलोनाइजरों ने इस कड़े नियम को ताक पर रख दिया। आरोप है कि बिना किसी बिक्री नकल के, तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों (साहबों) से सीधे ‘साठगांठ और तगड़ी सेटिंग’ बिठाई गई। इसके बाद उप-पंजीयक को खास निर्देश देकर इन सरकारी जमीनों की अवैध रजिस्ट्रियां धड़ल्ले से कूट दी गईं।
श्रावण अग्रवाल और इंद्रा प्रसाद शर्मा के नाम खुली फाइल
कलेक्टर जनदर्शन में सौंपे गए शिकायती पत्र में उन कॉलोनाइजरों के नाम और खसरा नंबर साफ तौर पर उजागर किए गए हैं, जिनके नाम पर आज करोड़ों की यह सरकारी जमीन बोल रही है और जहां कॉलोनियां तानी जा रही हैं:
कब्रिस्तान की भूमि पर कॉलोनी का खेल: पुराना मिसल रिकॉर्ड जिस खसरा नंबर 77/2 की जमीन को कब्रिस्तान और श्मशान के रूप में दर्ज करता है (जो पहले बाबा जी की तपस्या भूमि के बदले विस्थापितों को आवंटित की गई थी), वह अ-हस्तांतरणीय जमीन आज कॉलोनाइजर श्रावण अग्रवाल (पिता: बजरंग अग्रवाल, निवासी: जगतपुर) के नाम पर अवैध रूप से दर्ज हो चुकी है।
चरनोई और आम रास्ते पर कब्जा: इसी कब्रिस्तान भूमि से लगी हुई अन्य प्राइम लोकेशन की सरकारी जमीनें (खसरा नंबर 127, 128 और 132), जो पुराने मिसल बंदोबस्त में घास भूमि (चरनोई), स्थाई पगदंडी और ग्रामीणों के आने-जाने के आम रास्ते के रूप में दर्ज थीं, उन्हें कॉलोनाइजर इंद्रा प्रसाद शर्मा (पिता: सूरज भान शर्मा, निवासी: कोतरारोड़, दरोगा पारा) के नाम पर गुपचुप तरीके से रजिस्ट्री करवाकर दर्ज कर लिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां, अब हाई कोर्ट जाने की तैयारी
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने ‘जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य’ मामले में स्पष्ट आदेश दिया था कि सार्वजनिक उपयोग की भूमि जैसे श्मशान, तालाब या चरनोई को किसी भी निजी फायदे या व्यावसायिक कॉलोनी निर्माण के लिए डाइवर्ट या बेचा नहीं जा सकता। रायगढ़ में हुआ यह खेल सीधे तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना है।
कलेक्टर जनदर्शन में लिखित शिकायत और पावती लेने के बाद अब पीड़ित ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दोटूक कह दिया है कि अगर प्रशासन ने इस अवैध ‘सेटिंग’ से हुई रजिस्ट्रियों को तुरंत निरस्त कर जमीन वापस सरकारी घोषित नहीं की, तो वे साक्ष्यों के साथ बिलासपुर हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर करेंगे, जिसकी पूरी कानूनी तैयारी हो चुकी है।
अब देखना यह होगा कि जनदर्शन में इस गंभीर शिकायत के बाद कलेक्टर साहब बिना बिक्री नकल के रजिस्ट्री करने वाले अपने ही विभाग के अधिकारियों और इन रसूखदार कॉलोनाइजरों पर क्या कड़ा एक्शन लेते हैं!